Wednesday, May 29, 2019

第五代移動互聯網即將無處不在

埃塞俄比亞首都亞的斯亞貝巴。遠遠望去,非洲聯盟總部大廈儼如一艘巨大航天飛船,在夕陽映照下熠熠生輝,和比鄰的摩天大樓并肩主宰天際綫。
進入電梯,聽到的是中文歡迎詞;棕櫚盆景上有中國開發銀行的徽標。所到之處,蛛絲馬跡都顯示,中國的資金援助讓這座大樓成爲現實。
2006年,北京承諾投入2億美元修建非盟總部大廈「非盟會議中心」。2012年竣工,内部一應设备由中國公司定制,包括先進的電腦系統。這座傲然高聳的大廈如今成了中非關係日益密切的象徵。過去20年,中非貿易持續飆升。根據麥肯錫咨詢公司的統計,每年增幅約為20%。中國成了非洲最大的經濟夥伴。
2018年1月,法國報紙《世界報》投下一枚炸彈:非盟電腦系統遭到入侵。
報紙援引多名消息人士話說,過去五年,每晚零點到兩點,非盟大廈網絡服務器中大批數據被秘密傳送到八千公里外、位于上海的運算中心。
據稱,這種現象總計連續發生1825天。
《世界報》報導,事件2017年曝光。當時,為非盟工作的一位非常認真負責的科學家注意到,辦公室原本應空蕩蕩的時段,服務器卻非常地忙。
報道還說,一番大檢查,在大樓墻内、辦公桌内還發現麥克風、監聽設備。
非盟、中國迅速作出反應,譴責報道「聳人聽聞、荒誕不經」,是西方媒體企圖破壞一個更強大中國和更獨立非洲之間的關係。
但《世界報》說,非盟官員曾私下表示,擔心他們過於依賴中國援助、擔心這種依賴可能帶來的後果。
風波當中,鮮見報道的一個事實是:
非盟總部信息和通訊系統的主要供應商是中國最著名的電訊公司:華為。
「這並不意味著華為是數據失竊的同謀。但是,考慮到華為在向非盟大廈、特別是非盟數據中心提供設備及關鍵信息和通訊服務方面扮演的角色,考慮到連續五年、每天都有大量數據失竊,很難理解華為怎麽能做到自始至終完全不知情。」
華爲一名發言人告訴BBC,如果說非盟總部電腦數據長期泄露,這并不源自華爲向非盟提供的技術。華爲向非盟項目提供的服務包括數據中心設備,但這些設備「沒有數據存儲和傳輸功能」。
沒有證據顯示,中國政府或者其它任何人曾使用華為電訊設備獲取華為客戶數據。華爲只是非盟總部項目的供應商之一。
實際上,從來沒有人正式、有記錄在案地確認,非盟電腦系統曾經被侵入。
但是,這類報道給針對華為長期存在的疑心添了柴:中國大公司可能會受中國政府過度影響。
「30年前我們創業時是沒有電話的。那時打電話是用搖把子來搖電話,就像第二次世界大戰戰爭片看到的搖電話。那時我們很不發達。」
說這番話的,是世界第二大智能手機生產商華爲的創始人、總裁任正非。他在位於深圳的華為總部接受BBC采訪,談起創業之初的情況。
華爲總部大廈,也是任正非半輩子打拼取得今日成功的象徵。
走進大門,映入眼簾的是長長的大理石的階梯、上面鋪著毛絨絨的紅地毯。階梯頂端的墻上挂著一幅巨大的畫,描繪中國傳統新年的景象。
距深圳只有幾十公里的東莞,華爲新基地更是令人刮目相看。這是華爲的研發中心,大約25000人在這裏工作。
基地由12個小鎮組成,每一個都是按照不同的歐洲名城複製的,比如巴黎、格拉納達、博洛尼亞。
此情此景,就好像迪斯尼重新規劃和建造了硅谷。古羅馬風的立柱長廊、巴黎範的咖啡廳,精心修剪的草坪、靜謐的人工湖,小鎮之間小火車穿梭往返......
他說,那時中國改革開放剛剛啓動不久,「正在從計劃經濟走向市場經濟,不是我們不知道市場經濟為何物,連中央領導也不知道市場經濟為何物......實際上就是走到了一種完全不容易生存的時候。」
任正非生於1944年,當時的中國連年戰亂、民不聊生,任正非的老家貴州省是中國最貧困的地區之一。
成長過程中的任正非連續許多年經歷的只有艱辛。他家有七個孩子,任正非排行老大。爲逃避貧困、單調的生活,任正非作出和那個年代中國許多年輕人同樣的選擇:參軍。
正非自稱是「沒有軍銜的退伍軍人」。入伍后,他曾在中國人民解放軍基建工程兵部門歷任技術員、工程師等。1983年中國裁軍,任正非轉業、進入電子領域。
任正非自己承認,最開始,他並不是一個出色的商人。
他說,「我一個完全是在軍隊裏工作、完全服從命令的人突然在市場經濟下來進行貨物的交付運作,我是完全不熟悉的,所以我也吃過虧、上過當、栽過跟頭。」
但他學的很快,而且很熱衷研習西方商業運作和歐洲歷史。
他說,「我創立華爲以後,就要去琢磨到底市場經濟為何物。我在研究時閱讀了許多法律書籍,包括歐美很多法律書籍。中國沒有這些,我只能閲讀歐美的法律書籍,我就悟出了一個道理。」
1988年任正非創辦華爲。初期華為主要業務是向中國農村市場出售簡單的電訊器材。幾年之内,華為就開始自行研發、生産設備。
1990年代,華爲曾獲得中國政府合約、向人民解放軍供應電訊設備。
1995年,華為的銷售額達到大約22万美元,主要市場仍是中國農村地
早年的從商經歷讓任正非堅守一種強烈的信念:保護華為免受股市起伏動蕩的衝擊。華為是私有企業、員工持股,這讓任正非有更大的自由、把更多的利潤投入研發。
華為每年的研發投入為200億美元,位居世界企業前茅。
在解釋華為的成功時,任正非這樣說,「上市公司要看財務報表,不能投多了,利潤少了,股票掉下來。我們是爲了理想而奮鬥。我們知道,只要把肥料放到土地裏面,土地肥沃了,最終土地還是我們的,那我們爲什麽今天要把肥料分了呢?所以,我們投資,而且投資強度大於別人,就會領先別人獲得成功。」坊間流傳著這樣一個小故事。華為創業初期,一天,任正非正在給員工做飯(任正非喜歡烹飪,至少傳説是這樣),突然從廚房衝出來,對全房間的員工大聲宣佈:20年后華為將闖入全球電訊市場的前三名!
結果確實如此,而且,華為的業績還超出了任正非當年的預期。
現在,華為是世界第一大電訊網絡設備供應商。
當年立志追趕蘋果,今天,華為智能手機的銷量已經超過iPhone。

Monday, May 6, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

लेकिन ये तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि उन्हीं राजीव गांधी ने भारत को कंप्यूटरीकृत करने का सपना देखा था, उनके शासनकाल में टेलीफोन और दूर संचार उद्योग में भारत में बुनियादी सुविधाएं बढ़ीं. राजीव गांधी ने भारत को 21वीं सदी में ले जाने का सपना देखा था और उसको लेकर कई ज़रूरी कदम उठाए थे.
लेकिन यह सब बातों का ख्याल नरेंद्र मोदी क्यों करेंगे. जब वो राजीव गांधी को निशाना बना रहे थे तो उन्हें संभवत यह बात भी याद नहीं रही कि उनके अपनी पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण ऑन कैमरा रिश्वत लेते हुए पकड़े गए थे. पार्टी के एक और नामचीन नेता दिलीप सिंह जूदेव ऑन कैमरा कहते हुए पकड़े गए थे- पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं.
हालाँकि नरेंद्र मोदी के भाषणों में तथ्यों के साथ हेरफेर और व्यक्तिगत हमले करना कोई नहीं बात नहीं है. वे किसी को पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड बता सकते हैं, कभी विपक्ष की सभी नेताओं को जेल भेजने की धमकी दे सकते हैं. बावजूद इन सबके उनके ताजा बयान से दो ही बात जाहिर हो रही है.
पर इसे सत्ता की ठसक कहें या फिर चार चरणों के चुनाव के बाद हार की किसी आशंका में मोदी ये भी भूल गए कि राजनीति लोकलाज से चलने वाली चीज़ है. जिस अटल बिहारी वाजपेयी की नरेंद्र मोदी को पहली बार गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका रही, उन्हीं अटल बिहारी वाजपेयी की जानलेवा बीमारी का इलाज राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए कराया था, जिसकी भनक तक उन्होंने किसी दूसरे को लगने नहीं दी थी.
इस बात का खुलासा राजीव गांधी की मौत के बाद खुद अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था कि वे राजीव गांधी की बदौलत ही जीवित हैं. और तो और मोदी जिस हिंदुत्व की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा हैं, उस धर्म में भी उन लोगों के प्रति शालीनता बरतने की परंपरा रही है जो जीवित नहीं हो.
बहरहाल, नरेंद्र मोदी ने राजीव गांधी पर जिस तरह से निशाना साधा है, उससे प्रियंका गांधी के इस आरोप में दम दिखता है कि मोदी जी के दिमाग़ में उनके परिवार के प्रति एक तरह की सनक है. प्रियंका गांधी ने ट्वीट किया है, शहीदों के नाम पर वोट मांगकर उनकी शहादत को अपमानित करने वाले प्रधानमंत्री ने कल अपनी बेलगाम सनक में एक नेक और पाक इंसान की शहादत का निरादर किया.
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वहीं मोदी के बयान पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस तरह से रिएक्ट किया है, उसकी भी तारीफ़ हो रही है. राहुल गांधी ने ट्वीट किया है, "मोदी जी, युद्ध समाप्त हो चुका है. आपके कर्म आपका इंतज़ार कर रहे हैं. खुद को लेकर अपनी सोच को मेरे पिता पर डालने से आप बच नहीं पाएंगे. प्यार और जोरदार झप्पी. राहुल."

Friday, April 12, 2019

जल्दी मिट गई वोट की स्याही!

"मैं जब यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट हुई, मैंने पाया कि लोग मुझसे बहुत अधिक उम्मीद रखने लगे थे. मुझे शादी करनी थी, मां बनना था, अच्छे वेतन वाली नौकरी पानी थी. अपने आस पास की अधिकांश लड़कियों के साथ ये होते हुए मैं देख चुकी हूं- वो अपने लिए असल में क्या चाहती हैं, उसे भूल जाने को मजबूर होना पड़ता है. "
एक फ़ोटोग्राफ़र के रूप में पहले साल हबीबा ने महसूस किया कि वो चाहे जितना मेहनत करें, ये काफ़ी नहीं है, "अगर आप महिला हैं और ख़ुद को साबित करना चाहती हैं, तो आपको मर्दों के मुक़ाबले दोगुनी मेहनत करनी होगी."
वो कहती हैं, "मुझे लगा कि एक इंसान के रूप में मैं ख़ुद से दूर होती जा रही हूं. इसके बाद मैंने ख़ुद को ख़ुश रखने की कोशिशें शुरू कीं, यानी ख़ुद से ईमानदार रहने की."
फ़ोटोग्राफ़र के रूप में क़रीब 6 साल पहले हबीबा ने एक सिरीज़ शुरू की, 'कन्सील्ड'.
वो कहती हैं, "इस एहसास को हटाने और लोगों की उम्मीदों को नकारने के एक तरीक़े के रूप में मैंने ये सिरीज़ शुरू की."
जब 2016 में हबीबा ने ढाका में अपनी तस्वीरों की एक प्रदर्शनी लगाई तो बहुत से लोगों का ध्यान गया.
कुल मिलाकर कला जगत में महिलाएं उनका संदेश समझ गईं, लेकिन कलादीर्घा संभालने वाले पुरुषों को अक्सर थोड़ा और समझाने की ज़रूरत पड़ती है.
वो कहती हैं, "महिलाएं इस बात को समझ गईं, कि मैं क्या बात कर रही हूं, क्योंकि इन अनुभवों से वो होकर गुज़री हैं. लेकिन स्वाभाविक तौर पर पुरुषों के साथ ऐसा मामला नहीं है."
रोज़गार के आंकड़ों में गिरावट और नौकरियों की कमी के सवाल पर पीयूष गोयल ने कहा, "हमें नौकरी और काम का फ़र्क़ समझने की ज़रूरत है. मुझे यक़ीन है कि भारत के लोग नौकरी और काम के बीच का अंतर समझते हैं. सच्चाई ये है कि काम मौजूद है. कुछ लोग भारत में बढ़ती बेरोज़गारी की बात जिस तरह कर रहे हैं, उस हिसाब से तो अब सड़कों पर दंगे हो जाने चाहिए थे. क्या कोई देश बिना काम पैदा किए 7-8 फ़ीसदी की दर से आर्थिक वृद्धि कर सकता है?"
गोयल ने कहा, "हमारी सरकार ने लोगों को ख़ुद का रोज़
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में प्रतिबंधित पाकिस्तानी चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठनी शुरू हो गई हैं.
सुरक्षा परिषद् के तीन स्थायी सदस्य- अमरीका, ब्रिटेन और फ़्रांस मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने के पक्ष में हैं.
अख़बार सूत्रों के हवाले से लिखता है कि तीनों देशों ने चीन को अज़हर पर अपना रुख़ साफ़ करने के लिए 23 अप्रैल तक का अल्टीमेटम दिया है. इससे पहले चीन सुरक्षा परिषद में मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव को चार बार वी
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यंग्यात्मक फ़िल्म 'भबिष्योतेर भूत' पर रोक लगाने की वजह से पश्चिम बंगाल सरकार पर 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है.
अदालत ने देश में बढ़ती असहिष्णुता पर चिंता जताई और मतभिन्नता वाली आवाज़ों को दबाने की कोशिशों पर भी अपनी राय ज़ाहिर की.
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और हेमंत गुप्ता की पीठ ने अपने फ़ैसले में कहा कि कलाकारों को अभिव्यक्ति और आलोचना की पूरी आज़ादी है. अदालत ने ये भी कहा कि सरकारी एजेंसियां कलाकारों की बोलने की आज़ादी में दख़ल नहीं दे सकती और न ही उन पर किसी तरह का लगाम लगा सकती है.
फ़ैसला सुनाते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने लिखा, "हमारा संविधान सत्ता में बैठे लोगों को असहमति या विरोध की आवाज़ें कुचलने की अनुमति नहीं देता है."
अदालत ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी ताक़त का दुरुपयोग करते हुए एक ऐसी फ़िल्म की स्क्रीनिंग रुकवाई जिसे सेंसर बोर्ड ने मंज़ूरी दी थी.
टो कर चुका है.
तीनों देशों ने मिलकर चीन से तकनीकी आधार पर इस प्रस्ताव से बाधा हटाने के लिए कहा है. सुरक्षा परिषद् की 1267 प्रतिबंध समिति अगले कुछ दिनों में अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए एक बार फिर नए सिरे से प्रस्ताव ला सकती है.
14 फ़रवरी को भारत-प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ़ के क़ाफ़िले पर हमले के लिए भारत मसूद अज़हर की अगुवाई वाले जैश-ए-मोहम्मद को ज़िम्मेदार ठहराता है. इस हमले में 40 भारतीय जवान मारे गए थे.
गार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है. अब हमें नौकरी की संकुचित परिभाषा के दायरे से बाहर निकलना होगा."
पिछले महीने नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस ( ) के लीक हुए आंकड़ों से पता चला था कि प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में लगभग दो करोड़ नौकरियां ख़त्म हुई हैं.
साल 2011-12 में काम करने वाले पुरुषों की संख्या 30. 4 करोड़ थी जो साल 2017-18 में घटकर 28.6 करोड़ हो गई.

Tuesday, April 9, 2019

بريطانية تواجه السجن في دبي بسبب"إهانة" زوجة طليقها على فيسبوك

قال نشطاء إن امرأة بريطانية تواجه عقوبة السجن لمدة عامين، في مدينة دبي الإماراتية، لأنها وصفت زوجة طليقها بأنها "حصان"، وذلك عبر موقع فيسبوك.
وألقت السلطات الإماراتية القبض على "لاله شارافش"(55 عاماً) في مطار دبي بعد أن سافرت إلى هناك، لحضور جنازة زوجها السابق.
وتواجه المرأة ملاحقة قضائية، بسبب تعليقين على فيسبوك، نشرتهما على صور لحفل زواج ثان لطليقها، في عام 2016.
وقالت وزارة الخارجية البريطانية إنها تقدم الدعم لمواطنتها.
واستمر زواج شارافش مدة 18 عاما، أمضت من تلك المدة 8 أشهر في دبي، وذلك وفقا لمنظمة "محتجزون في دبي"   i
وبينما عادت إلى بريطانيا برفقة ابنتها ، بقي زوجها في الإمارات، وتطلق الزوجان.
واكتشفت شارافش أن طليقها تزوج بأخرى، حين شاهدت صورا للزوجين الجدد، على موقع فيسبوك.
ونشرت تعليقين باللغة الفارسية، قالت في أحدهما: "أتمنى أن تذهب تحت الأرض أيها الأحمق، عليك اللعنة، تركتني لأجل هذا الحصان".
ووفقا لقوانين الجرائم الإلكترونية في دولة الإمارات، يمكن سجن أي شخص وتغريمه، بسبب كتابته تعليقات تتضمن تشهيرا، على مواقع التواصل الاجتماعي.
وقالت منظمة "محتجزون في دبي" إن شارافش قد يُحكم عليها بالسجن، لمدة تصل إلى عامين، وتُغرم 50 ألف جنيه إسترليني، على الرغم من أنها كتبت تعليقاتها، على فيسبوك، أثناء وجودها في بريطانيا.
وقالت المنظمة إن زوجة طليق شارافش الراحل، التي تعيش في دبي، كانت قد أبلغت السلطات عن تلك التعليقات.
وأضافت المنظمة أن شارافش وابنتها سافرتا إلى الإمارات، في العاشر من مارس/ آذار الماضي، لحضور جنازة والد ابنتها وطليقها الذي توفي جراء نوبة قلبية.
وتابعت المنظمة أنه حين اعتقلت شارافش، كانت برفقة ابنتها البالغة من العمر 14 عاما، لكن الفتاة اضطرت لاحقا للعودة إلى بريطانيا بمفردها.
وقالت الرئيس التنفيذي لمنظمة "محتجزون في دبي" رادها ستيرلنغ، لبي بي سي نيوز، إن منظمتها ووزارة الخارجية البريطانية طلبتا من المدعية سحب الادعاء، لكنها رفضت.
وأضافت أن القرار "يبدو انتقاميا تماما".
وقالت السيدة ستيرلنغ إن موكلتها أُفرج عنها بكفالة، لكن تم مصادرة جواز سفرها، وتقيم حاليا في فندق.
وأضافت أن شارافش "مذهولة تماما"، وسيستغرق الأمر وقتا، لكي تتعافى من تلك المحنة.
وتابعت أن "كل ما تتمناه ابنتها الآن هو أن تعود إليها أمها".
وقالت ستيرلنغ إن الفتاة تقدمت باستئناف في قضية والدتها.
وأضافت: "لا أحد يدرك حقا" خطورة قوانين الجرائم الإلكترونية، في دولة الإمارات العربية، وتقاعست وزارة الخارجية البريطانية، عن تحذير السائحين منها بشكل كاف.
وقالت وزارة الخارجية البريطانية في بيان: "موظفونا يدعمون سيدة بريطانية وعائلتها، بعد احتجازها في دولة الإمارات العربية المتحدة".
وتابعت: "نحن على اتصال بالسلطات الإماراتية، فيما يتعلق بقضيتها".
أظهرت دراسة حديثة أن الأطعمة التي نتناولها تتسبب في الوفاة المبكرة، لنحو 11 مليون شخص سنويا حول العالم.
وتوصلت الدراسة، التي نشرت نتائجها في دورية لانسيت الطبية، إلى أن النظام الغذائي اليومي هو القاتل الأكبر مقارنة بالتدخين، ويتسبب الآن في واحدة من بين كل خمس حالات وفاة حول العالم.
الملح - سواء في الخبز أو صلصة فول الصويا أو الأغذية المصنعة - هو الذي يحصد العدد الأكبر من تلك الأرواح.
ويقول الباحثون إن هذه الدراسة لا تتعلق بالسمنة، وإنما بالأغذية "ردئية الجودة"، التي تضر بالقلب وتسبب السرطان.
وتعد الدراسة، التي حملت عنوان "تبعات الأمراض على العالم"، التقييم الأكثر موثوقية لأسباب الوفاة، في كل دولة من دول العالم.
وقال البروفيسور كريستوفر موراي، مدير معهد المقاييس الصحية والتقييم بجامعة واشنطن، لبي بي سي: "توصلنا إلى أن النظام الغذائي هو أحد العوامل الرئيسية، المؤثرة على الصحة حول العالم. إنه خطير حقا".
نحو 10 ملايين، من بين 11 مليون حالة وفاة مرتبطة بالنظام الغذائي، كانت بسبب أمراض القلب والأوعية الدموية، وهذا ما يفسر لماذا يمثل الملح مشكلة كبيرة.
تناول كميات كبيرة من الملح يرفع ضغط الدم، وهذا بدوره يزيد من مخاطر الإصابة بنوبات قلبية، وسكتات دماغية.
ويمكن أن يكون للملح أثر مباشر على القلب والأوعية الدموية، ما قد يؤدي إلى فشل في وظائف القلب، عندما لا يكون يعمل بفعالية.
بينما الحبوب الكاملة والفواكه والخضروات لها تأثير معاكس، فهي "وقائية للقلب والأوعية الدموية"، وتقلل من خطر الإصابة بأمراض القلب.
ويتسبب مرض السرطان والسكري من الفئة الثانية في بقية حالات الوفاة، المرتبطة بالأنظمة الغذائية.
لا توجد دولة بها نظام غذائي مثالي، وتفضل كل دولة جزءا ما، من نظام غذائي صحي مقارنة بغيرها، ويوضح الرسم التالي إلى أي مدى يبتعد العالم عن النظام الغذائي الصحي.
الأطعمة الصحية الغائبة عن معظم الوجبات الغذائية حول العالم هي المكسرات والبذور، وفقاً للدراسة.
ويلاحظ القراء الشغوفون أن المكسرات والبذور قد شملتهم دراسة "النظام الغذائي لكوكب الأرض"، التي كُشف عنها في يناير/ كانون الثاني الماضي، وتوضح سبل إنقاذ أرواح البشر والكوكب، وإطعام 10 مليارت شخص.
قالت البروفيسور نيتا فوروهي، من جامعة كامبريدج: "التصور هو أنها عبوات صغيرة من الطاقة ستجعلك بدينا ، في حين أنها مليئة بالدهون الجيدة".
"ومعظم الناس لا يرون المكسرات كطعام رئيسي، والمشكلة الأخرى هي التكلفة".
اعتقدت أن اللحوم والسكر هي الأشرار؟
تصدر الجدل الواسع حول الدهون مقابل السكر، والارتباط بين اللحوم الحمراء والمصنعة ومرض السرطان، عناوين الأخبار خلال السنوات الأخيرة.
ويقول البروفيسور موراي: "إنها قد تكون ضارة كما نثبت، لكنها أقل ضررا بكثير، من انخفاض مستويات الحبوب الكاملة، والفواكه والبذور والخضروات المتناولة".
وأظهرت الدراسة أن الكثير من المشروبات الغازية تشرب في كل أنحاء العالم.
ويقول الباحثون إن الوقت قد حان للنشطاء في مجال الصحة، لكي ينتقلوا من الحديث عن العناصر الغذائية، مثل الدهون والسكر، إلى الترويج للأطعمة الصحية.
ووفقا للباحثين، فإن الأنظمة الغذائية السيئة تقلل عامين، من العمر المتوقع للأشخاص حول العالم.
دول البحر المتوسط، وخاصة فرنسا وأسبانيا وإسرائيل، لديها أقل معدل من أعداد الوفيات، المرتبطة بالنظام الغذائي في العالم.
أما دول جنوب وجنوب شرق ووسط آسيا تقع في الطرف المقابل، من حيث أعلى المعدلات.
إسرائيل لديها أقل معدل للوفيات المرتبطة بالنظام الغذائي: 89 لكل 100 ألف شخص سنويا.
أوزبكستان لديها أعلى معدل للوفيات المرتبطة بالنظام الغذائي: 892 لكل 100 ألف شخص سنويا.
الحقوقية.

Tuesday, April 2, 2019

क्या मायावती दलितों के बीच चंद्रशेखर के बढ़ते प्रभाव से परेशान हैं?

बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती का भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर को बीजेपी का एजेंट बताना और फिर चंद्रशेखर का मायावती पर पलटवार करना एक नई राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है.
राजनीतिक जगत में इसे दो तरीक़े से देखा जा रहा है- दलितों के बीच चंद्रशेखर के बढ़ते प्रभाव से मायावती का परेशान होना और चंद्रशेखर का समय से पहले बड़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पाल लेना.
भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर दो साल पहले उस वक़्त चर्चा में आए थे जब सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में जातीय हिंसा हुई थी. उस समय उनका संगठन भीम आर्मी और उसका स्लोगन 'द ग्रेट चमार' भी ख़बरों में छाया रहा.
हिंसा के आरोप में चंद्रशेखर समेत भीम आर्मी के कई सदस्यों को गिरफ़्तार किया गया था और उस वक़्त ये मामला भी काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने दलितों के साथ हुई हिंसा पर संवेदना जताने में काफ़ी देर की. बहुजन समाज पार्टी ने इसके ख़िलाफ़ कोई आंदोलन भी नहीं किया.
मायावती शब्बीरपुर गईं ज़रूर लेकिन हिंसा के कई दिन बाद. उस समय भी उन्होंने दलित समुदाय को भीम आर्मी जैसे संगठनों से सावधान रहने की हिदायत दी थी. मायावती ने उस वक़्त भी भीम आर्मी और चंद्रशेखर को बीजेपी का 'प्रॉडक्ट' बताया था.
उसके बाद चंद्रशेखर जब कभी भी सुर्खियों में रहे, मायावती ने या तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और दी भी तो चंद्रशेखर को अपना प्रतिद्वंद्वी समझकर. हालांकि जेल से छूटकर आने के बाद चंद्रशेखर ने सीधे तौर पर कहा था कि वो बहुजन समाज पार्टी और उसकी नेता मायावती के समर्थन में हैं और उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं.
भीम आर्मी ख़ुद को एक सामाजिक संगठन के तौर पर पेश करता है और उसके प्रमुख चंद्रशेखर कई बार ख़ुद कह चुके हैं कि उनका राजनीति में आने का अभी कोई मक़सद नहीं है.
लेकिन वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने की उनकी घोषणा से ये तो साफ़ हो गया कि भीम आर्मी एक राजनीतिक दल में अभी भले न तब्दील हो लेकिन चंद्रशेखर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा से इनकार नहीं किया जा सकता.
जानकारों के मुताबिक़, चंद्रशेखर के राजनीति में आने से सबसे ज़्यादा ख़तरा बहुजन समाज पार्टी को दिखता रहा है क्योंकि जिस दलित समुदाय को बीएसपी अपना मज़बूत वोट बैंक मानती है, चंद्रशेखर और उनकी भीम आर्मी भी उसी समुदाय के हित में काम करते हैं.
चंद्रशेखर की वाराणसी से चुनाव लड़ने की घोषणा ने बीएसपी नेता मायावती को हैरान कर दिया और उन्होंने तत्काल बयान जारी करके चंद्रशेखर पर बीजेपी का एजेंट होने का आरोप मढ़ दिया.
हालांकि चंद्रशेखर ने भी ट्वीट के ज़रिए मायावती के बयान को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया है लेकिन जानकारों का मानना है कि मायावती ने इस मामले में जल्दबाज़ी कर दी है.
वरिष्ठ पत्रकार रियाज़ हाशमी कहते हैं, "मायावती ने बहुत ही जल्दबाज़ी में और बहुत बड़ा आरोप चंद्रशेखर पर लगा दिया है. सहारनपुर और उसके आस-पास के इलाक़ों में दलित समाज में उसका संगठन जिस तरह से काम कर रहा है और समाज के बीच उसका जितना असर है, उसे देखते हुए उसके प्रभाव को नकारना भूल होगी."
हालांकि रियाज़ हाशमी ये भी कहते हैं कि चंद्रशेखर और उनकी भीम आर्मी का प्रभाव राजनीति और चुनावी परिणामों में कितना दिखता है, इसका आज तक परीक्षण तो नहीं हुआ, लेकिन प्रभाव पड़ना ज़रूर चाहिए.
उनके मुताबिक, "पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दलित समुदाय अच्छी तरह जानता है कि बहुजन समाज पार्टी एक राजनीतिक पार्टी है और उसकी सोच में राजनीतिक लाभ सबसे पहले रहेगा. दलितों के लिए ज़मीन पर संघर्ष भीम आर्मी पिछले दो-तीन साल से जिस तरह कर रही है, उससे उनके बीच उसकी पैठ काफ़ी गहरे तक बढ़ी है. इस स्तर तक कि यदि मायावती भी उसके बारे में कुछ ग़लत कहें तो शायद लोग यक़ीन न करें."
दरअसल, मायावती और चंद्रशेखर दोनों का प्रभाव क्षेत्र सहारनपुर समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश रहा है. भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर कई बार बीएसपी और मायावती के समर्थन की बात करके बहुजन एकता का संदेश देने की कोशिश करते हैं लेकिन मायावती उनकी इस हमदर्दी को भी आशंका भरी निग़ाह से ही देखती रही हैं. रविवार को उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि बीजेपी चंद्रशेखर को एक ख़ास रणनीति के तहत उनकी पार्टी में भेजना चाहती थी.
बताया जा रहा है कि इसके पीछे मायावती का वह डर है जिसमें उन्हें अपने दलित मतदाताओं का बीएसपी से दूर होने का अंदेशा है. मायावती ने उस वक़्त भी काफ़ी तीख़ी प्रतिक्रिया दी थी जब कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी अस्पताल में चंद्रशेखर को देखने गईं थीं और दिल्ली की रैली में चंद्रशेखर के मंच पर कांशीराम के परिजन मौजूद थे.
लेकिन दलित चिंतक और मेरठ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक सतीश प्रकाश दलितों में चंद्रशेखर के बढ़ते प्रभाव को तो स्वीकार करते हैं लेकिन चंद्रशेखर की वजह से मायावती के लिए कोई राजनीतिक ख़तरा नहीं देखते.
उनका कहना है, "चंद्रशेखर कुछ जल्दबाज़ी कर रहा है. उसे पहले दलित समुदाय में अपने को साबित करना चाहिए और तब उन्हें लीड करने की कोशिश करनी चाहिए. अभी उसने जो कुछ भी किया है, वो इतना पर्याप्त नहीं है कि दलित समुदाय उसकी आड़ में बाबा साहब और कांशीराम की परंपरा से जुड़ी बहुजन समाज पार्टी की अनदेखी कर दे."
सतीश प्रकाश के मुताबिक़, "चंद्रशेखर ने मायावती के ख़िलाफ़ भले ही कुछ नहीं कहा या उनके समर्थन की बात कहता रहा है लेकिन जेल से छूटने के बाद आप उसकी गतिविधियों पर नज़र डालिए तो पता चलता है कि उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा किस तरह बढ़ रही है."
"मायावती को बुआ कहना, रैली निकालना, मौलाना मदनी के पास जाना, प्रियंका गांधी का उसे देखने आना ये सब क्या है? दरअसल, चंद्रशेखर वो ग़लती कर रहा है जो बाक़ी दलित नेताओं ने की यानी एक-दूसरे की आलोचना की और आख़िर में कहां खो गए, कोई नहीं जानता."

Friday, February 22, 2019

السعودية أيضا تحتاج باكستان.

تكرر أمي في الهاتف كل مرة تحادثني للاطمئنان علي: "يا بنيتي، البعيد عن العين بعيد عن القلب"، وأنا أدافع بشدة لأقنعها وأقنع لنفسي "قد نقترب كلما ابتعدنا".
يفقد رواد العلاقات عن بعد الكثير.
يفقدون "الآنية"؛ فكل لحظة تمر - حلوة كانت أم مرة - لا يستطيع أحدنا مشاركة الآخر بها وقت حدوثها. أصبحنا نتشارك كل شيء بيننا عبر شاشة زجاجية عن بعد؛ التطبيب حتى أصبح عن بعد، فإذا مرضت ينصحني بما يجب علي تناوله حتى تتحسن صحتي، لكن قلبي يعتصر وأنا أقوم بذلك وحدي بعد أن أفقدتني الحمى القدرة على الحركة.
يفقدون "الإحساس بالمشاركة"؛ فأجلس وحدي على طاولة الطعام، كوب قهوة واحد في الصباح، وفرشاة أسنان واحدة في الحمام.
يفقدون "تدفق المشاعر في الوقت ذاته"؛ فلا يمكن أن أتوقع مفاجأة رومانسية لأنه حتى وإن أنهى عمله باكرا، واستقل أول طائرة فسيحتاج ثماني ساعات على الأقل ليفاجئني.
لكن بالمقابل لم يعد هناك مكان للرتابة في حياتي بفضل هذه العلاقة؛ ولا نظام ثابت. وتمكنت من الإجابة على أهم سؤال: "لماذا أحتاج لشريك في الحياة".
في ظل ما تعانيه من نفاد في الاحتياطيات الأجنبية، ومن عجز متزايد في الموازنة، ومن صراع لتأمين مستقبلها المالي، تبالغ باكستان في إظهار حفاوة استقبالها للحاكم الفعلي وولي العهد السعودي محمد بن سلمان.
إذاً، من السهل الوقوف على سرّ حاجة رئيس الوزراء الباكستاني عمران خان للأموال، وعلى وجه السرعة.
وكعهده، حضر محمد بن سلمان إلى إسلام آباد ومعه وعود بالمليارات.
لكن المال يمثل بُعْدًا واحدًا فقط من أبعاد العلاقة المتأصلة بين البلدين اللذين تجمعهما الكثير من المصالح.
ومن المزمع أن تكون باكستان المحطة الأولى في جولة آسيوية تشمل خمس دول، لكن رحلتَي ولي العهد إلى إندونيسيا وماليزيا قد تأجلتا بخلاف زيارتيه للصين والهند اللتين يُنظر إليهما كخطوة ذكية من ولي العهد المثير للجدل.
كانت آخر الزيارات الملكية السعودية المتسمة بالكثير من البزخ في 2006، وقام بها العاهل السعودي آنذاك، عبد الله بن عبد العزيز، في دولة باكستان النووية.
وحظي الجانب الأمني باهتمام جادّ، تجلّى في تصريح عمران خان بأنه يتولى شخصيًا الإشراف على مهمة الترتيبات الأمنية.
وتأتي جولة الأمير الشاب -33 عاما- وسط احتدام التوترات في المنطقة، بعد أن ألقت الهند باللائمة على باكستان في الهجوم الأكثر دموية على مدى عقود والذي استهدف قوات أمنية في الجزء الواقع تحت الإدارة الهندية من كشمير.
وفور دخول موكب طائرات ولي العهد الأجواء الباكستانية مساء الأحد، سارعت إلى اصطحابه طائرات مقاتلة باكستانية من طراز JF-17 Thunder في حين توقفت جميع رحلات الطيران الأخرى.
وحظي ولي العهد باستقبال عمران خان وقائد الجيش الباكستاني، حيث بُسطت له السجادة الحمراء بمطار عسكري وأطلقت المدفعية 21 طلقة تحية للضيف السعودي.
وقاد عمران خان بنفسه محمد بن سلمان إلى مقر الإقامة الرسمي لرئيس الوزراء، حيث لا يقيم خان فعليا ولكن لزيارة محمد بن سلمان التي تستغرق يومين، وهي المرة الأولى التي ينزل به ضيف في زيارة رسمية.
ويُعتقد أن مئات الغرف فئة الخمس نجوم في إسلام آباد قد خُصّصت للوفد المرافق لولي العهد والبالغ تعداده ألف شخصية بارزة.
وأشارت تقارير إلى أنه من ترتيبات الزيارة اطلاق آلاف الحمائم لدى استقبال ولي العهد.
وسيُمنح أعلى وسام مدني باكستاني لولي العهد، الذي يمتدحه خان لـ "أفكاره الإصلاحية"لم يعد يمتلك البنك المركزي الباكستاني سوى 8 مليارات دولار من الاحتياطات الأجنبية، فضلا عن ما يعانيه من أزمة في ميزان المدفوعات.
ومنذ تنصيبه في أغسطس/آب الماضي طلب عمران خان، لاعب الكريكيت السابق المرموق، مساعدات مالية من الدول الصديقة، وألحّ في سؤاله تقليص حجم مساعدات المالية التي قد تحتاجها باكستان من صندوق النقد الدولي، في ظل ظروف بالغة الصعوبة.
وتسعى باكستان إلى الحصول على حزمة الإنقاذ الثالثة عشرة منذ حقبة الثمانينيات، وكانت السعودية قد أقرضتها ستة مليارات دولار.
وتأتي زيارة بن سلمان في أعقاب زيارة ولي عهد أبو ظبي محمد بن زايد آل نهيان لباكستان، حيث تعهدت الإمارات العربية المتحدة بتقديم قرض قيمته ستة مليارات دولار لدعم اقتصاد باكستان المتأزم.
لكن السعودية ترفع السقف وتعلن في تقارير إعلامية عن توقيع اتفاقيات مؤقتة بقيمة 20 مليار دولار.
وتتمثل درة تاج تلك الاتفاقيات إبرام اتفاق لبناء مصفاة نفط جديدة بقيمة 10 مليارات دولار في ميناء غوادار الجنوبي.
ويعتبر ميناء غوادار بمثابة المركز العصبي للممر الاقتصادي الصيني-الباكستاني الذي تبلغ تكلفته 60 مليار دولار.
وتحظى الأموال الصينية بالكثير من التقدير من جانب الحكومة الباكستانية، لكن محللين يقولون إنها تأتي مصحوبة بقيود؛ حيث تشترط الصين أن يتولى عمال صينيون أعمال بناء المشاريع الصينية، فضلا عن مخاوف من ازدياد نفوذ بكين.
وعليه، فإن الأموال القادمة من دول الخليج تحظى بترحيب بالغ في باكستان.

Thursday, February 7, 2019

इस्लामाबाद में सुप्रीम कोर्ट के बाहर क़ारी सलाम

लाहौर हाईकोर्ट के सामने आस-पास की इमारतें बौनी नजर आती हैं. ये शहर के ऐतिहासिक मॉल रोड पर स्थित है. लाल ईंट से बनी इमारत पर ऊंचे सफ़ेद गुंबद लगे हुए हैं. ये शहर की उन इमारतों में है जो लोगों को ब्रिटिश राज की याद दिलाती हैं.
हाई कोर्ट के आस-पास कई वकीलों के चैंबर्स हैं, जिनमें उनके जर्जर कार्यालय हैं. हाई कोर्ट की ठीक पीछे एक छोटा सा प्लाज़ा है. एक व्यस्त चाय की दुकान के ऊपर गुलाम मुस्तफ़ा चौधरी का चैंबर है.
चौधरी ईशनिंदा का विरोध करने वाले वकीलों के समूह 'ख़त्मे नबुवत' (मोहम्मद ही अल्लाह द्वारा भेजे गए अंतिम पैग़ंबर थे) के अध्यक्ष हैं.
ये लोग उन मुसलमानों को मुफ़्त सेवा देते हैं जो ईशनिंदा का मुक़दमा दर्ज कराना चाहते हैं.
इस समूह के साथ देश भर में कोई 800 स्वयंसेवक वकील काम करते हैं.
चौधरी बताते हैं, "जब देश भर में हमारी नज़र में कोई ईशनिंदा का मामला सामने आता है तो हम शिकायत करने वाले लोगों तक पहुंचते हैं और उन्हें मुफ्त में क़ानूनी मदद मुहैया कराते हैं."
"हम ऐसा अल्लाह को ख़ुश करने और पैगंबर मोहम्मद के सम्मान की रक्षा करने के लिए कर रहे हैं, हमें पैसे का कोई लोभ नहीं है."
चौधरी ने वकील के तौर पर अपना करियर शुरू करने के बाद ये फोरम करीब 18 साल पहले स्थापित किया था, अब उनकी उम्र 50 साल के पार हो चुकी है. वे बताते हैं कि ये काम उनके लिए मिशन जैसा है.
वे बताते हैं, "ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. ईशनिंदा के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. अकेले लाहौर में 40 ईशनिंदा के मामले दर्ज हुए हैं. जो लोग ईशनिंदा करते हैं उन्हें हीरो की तरह पेश किया जाता है, ये दुखद है."
जिस तरह से आसिया बीबी का मामला सामने आया है, उससे चौधरी खुश नहीं हैं.
वे कहते हैं, "उन्होंने पैगंबर का अपमान किया था, लेकिन पश्चिम में उन्हें हीरो की तरह देखा जा रहा है."
चौधरी सलमान तासीर की हत्या करने वाले मुमताज़ क़ादरी के भी वकील थे. उनके मुताबिक़ ईशनिंदा का क़ानून वरदान की तरह है और इससे 'भीड़ का इंसाफ़' करने के मौके सामने नहीं आते.
वे आगे बताते हैं, "मुमताज़ क़ादरी पुलिस के पास गवर्नर के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराने गए थे, लेकिन उनकी शिकायत सुनी नहीं गई. वे अपने हाथों में बंदूक़ उठाने के लिए मज़बूर नहीं होते अगर क़ानून ने अपना काम किया होता."
आसिया बीबी के मामले में क़ानून ने अपना काम किया, देश की सर्वोच्च अदालत तक मामला पहुंचा.
हालांकि उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं मिले, इसके बाद भी हिंसक प्रदर्शन हुए.
31 अक्टूबर को अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में जजों ने लिखा है, "ये अजीब संयोग है कि परिवादी का नाम आसिया का अरबी में मतलब दुराचारी होता है लेकिन इस मामले में जो परिस्थितजन्य साक्ष्य हैं उसे शेक्सपीयर के किंग लायर के शब्दों में कहा जाए तो उसके साथ पाप करने से ज्यादा पाप हुआ है."
इसके बावजूद सरकार आसिया बीबी को बरी किए जाने पर सु्प्रीम कोर्ट के फ़ैसले की समीक्षा करानेके लिए तैयार हो गई.
सरकार विरोध प्रदर्शन करने वालों को हटाना चाहती थी लेकिन बाद में सरकार ने तहरीक-ए-लबैक पर कार्रवाई की.
तहरीक-ए-लबैक के फायरब्रैंड नेता ख़ादिम हुसैन रिज़वी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया.
आसिया के परिवारवालों को क़रीब तीन महीने तक गोपनीय जगह पर रखा गया. वह कोर्ट से बरी ज़रूर हो गईं थीं लेकिन आज़ाद नहीं हो पाई थीं.
आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका पर 29 जनवरी को सुनवाई की. सुनवाई कुछ घंटे तक चली.
गुलाम मुस्तफ़ा चौधरी आसिया बीबी के ख़िलाफ़ वादी सलीम के वकील के तौर पर पेश हुए थे.
वे आसिया बीबी को बरी किए जाने के फ़ैसले में कोई ग़लती नहीं साबित कर पाए. ऐसे में कोर्ट ने याचिका ख़ारिज करते हुए पुराने फ़ैसले को कायम रखा.
पाकिस्तान के चीफ़ जस्टिस ने कहा कि आसिया के ख़िलाफ़ बयान देने वालों की गवाही में एकरूपता नहीं थी. उन्होंने ये भी कहा, "झूठी गवाहियों पर हम किसी को फांसी पर कैसे चढ़ा सकते हैं."
इस पूरे मामले को देखने के बाद, ये कहा जा सकता है कि क्या दुर्भाग्य है कि झूठी गवाहियों पर आधारित एक मुक़दमे से पूरे देश का सामाजिक ताना बाना प्रभावित रहा. आख़िर में जब सरकार ने अपनी ताक़त दिखाई तो क़ानून का राज स्थापित हुआ.
इसका संदेश साफ़ है, 'भीड़ का आदेश या फिर शासन पाकिस्तान में नहीं चलेगा.'
इससे ये भी स्पष्ट हुआ कि ईशनिंदा क़ानून का ग़लत इस्तेमाल की भी देश में इजाजत नहीं है.
यह पाकिस्तान के लिए ऐतिहासिक पल था. लेकिन यह क़ानून अभी भी मौजूद है. कोई भी इसमें संशोधन या फिर उसे वापस किए जाने की बात नहीं कर रहा है.
सलमान तासीर और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान भट्टी की हत्याएं अभी भी पूरे देश की आत्मा को झकझोर रही हैं.