लाहौर हाईकोर्ट के सामने आस-पास की
इमारतें बौनी नजर आती हैं. ये शहर के ऐतिहासिक मॉल रोड पर स्थित है. लाल
ईंट से बनी इमारत पर ऊंचे सफ़ेद गुंबद लगे हुए हैं. ये शहर की उन इमारतों
में है जो लोगों को ब्रिटिश राज की याद दिलाती हैं.
हाई कोर्ट के आस-पास कई वकीलों के चैंबर्स हैं, जिनमें उनके जर्जर कार्यालय हैं. हाई कोर्ट की ठीक पीछे एक छोटा सा प्लाज़ा है. एक व्यस्त चाय की दुकान के ऊपर गुलाम मुस्तफ़ा चौधरी का चैंबर है.
चौधरी ईशनिंदा का विरोध करने वाले वकीलों के समूह 'ख़त्मे नबुवत' (मोहम्मद ही अल्लाह द्वारा भेजे गए अंतिम पैग़ंबर थे) के अध्यक्ष हैं.
ये लोग उन मुसलमानों को मुफ़्त सेवा देते हैं जो ईशनिंदा का मुक़दमा दर्ज कराना चाहते हैं.
हाई कोर्ट के आस-पास कई वकीलों के चैंबर्स हैं, जिनमें उनके जर्जर कार्यालय हैं. हाई कोर्ट की ठीक पीछे एक छोटा सा प्लाज़ा है. एक व्यस्त चाय की दुकान के ऊपर गुलाम मुस्तफ़ा चौधरी का चैंबर है.
चौधरी ईशनिंदा का विरोध करने वाले वकीलों के समूह 'ख़त्मे नबुवत' (मोहम्मद ही अल्लाह द्वारा भेजे गए अंतिम पैग़ंबर थे) के अध्यक्ष हैं.
ये लोग उन मुसलमानों को मुफ़्त सेवा देते हैं जो ईशनिंदा का मुक़दमा दर्ज कराना चाहते हैं.
इस समूह के साथ देश भर में कोई 800 स्वयंसेवक वकील काम करते हैं.
चौधरी बताते हैं, "जब देश भर में हमारी नज़र में कोई ईशनिंदा का मामला सामने आता है तो हम शिकायत करने वाले लोगों तक पहुंचते हैं और उन्हें मुफ्त में क़ानूनी मदद मुहैया कराते हैं."
"हम ऐसा अल्लाह को ख़ुश करने और पैगंबर मोहम्मद के सम्मान की रक्षा करने के लिए कर रहे हैं, हमें पैसे का कोई लोभ नहीं है."
चौधरी ने वकील के तौर पर अपना करियर शुरू करने के बाद ये फोरम करीब 18 साल पहले स्थापित किया था, अब उनकी उम्र 50 साल के पार हो चुकी है. वे बताते हैं कि ये काम उनके लिए मिशन जैसा है.
वे बताते हैं, "ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. ईशनिंदा के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. अकेले लाहौर में 40 ईशनिंदा के मामले दर्ज हुए हैं. जो लोग ईशनिंदा करते हैं उन्हें हीरो की तरह पेश किया जाता है, ये दुखद है."
जिस तरह से आसिया बीबी का मामला सामने आया है, उससे चौधरी खुश नहीं हैं.
वे कहते हैं, "उन्होंने पैगंबर का अपमान किया था, लेकिन पश्चिम में उन्हें हीरो की तरह देखा जा रहा है."
चौधरी बताते हैं, "जब देश भर में हमारी नज़र में कोई ईशनिंदा का मामला सामने आता है तो हम शिकायत करने वाले लोगों तक पहुंचते हैं और उन्हें मुफ्त में क़ानूनी मदद मुहैया कराते हैं."
"हम ऐसा अल्लाह को ख़ुश करने और पैगंबर मोहम्मद के सम्मान की रक्षा करने के लिए कर रहे हैं, हमें पैसे का कोई लोभ नहीं है."
चौधरी ने वकील के तौर पर अपना करियर शुरू करने के बाद ये फोरम करीब 18 साल पहले स्थापित किया था, अब उनकी उम्र 50 साल के पार हो चुकी है. वे बताते हैं कि ये काम उनके लिए मिशन जैसा है.
वे बताते हैं, "ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. ईशनिंदा के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. अकेले लाहौर में 40 ईशनिंदा के मामले दर्ज हुए हैं. जो लोग ईशनिंदा करते हैं उन्हें हीरो की तरह पेश किया जाता है, ये दुखद है."
जिस तरह से आसिया बीबी का मामला सामने आया है, उससे चौधरी खुश नहीं हैं.
वे कहते हैं, "उन्होंने पैगंबर का अपमान किया था, लेकिन पश्चिम में उन्हें हीरो की तरह देखा जा रहा है."
चौधरी सलमान तासीर की हत्या करने वाले
मुमताज़ क़ादरी के भी वकील थे. उनके मुताबिक़ ईशनिंदा का क़ानून वरदान की
तरह है और इससे 'भीड़ का इंसाफ़' करने के मौके सामने नहीं आते.
वे आगे बताते हैं, "मुमताज़ क़ादरी पुलिस के पास गवर्नर के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराने गए थे, लेकिन उनकी शिकायत सुनी नहीं गई. वे अपने हाथों में बंदूक़ उठाने के लिए मज़बूर नहीं होते अगर क़ानून ने अपना काम किया होता."
आसिया बीबी के मामले में क़ानून ने अपना काम किया, देश की सर्वोच्च अदालत तक मामला पहुंचा.
हालांकि उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं मिले, इसके बाद भी हिंसक प्रदर्शन हुए.
वे आगे बताते हैं, "मुमताज़ क़ादरी पुलिस के पास गवर्नर के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराने गए थे, लेकिन उनकी शिकायत सुनी नहीं गई. वे अपने हाथों में बंदूक़ उठाने के लिए मज़बूर नहीं होते अगर क़ानून ने अपना काम किया होता."
आसिया बीबी के मामले में क़ानून ने अपना काम किया, देश की सर्वोच्च अदालत तक मामला पहुंचा.
हालांकि उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं मिले, इसके बाद भी हिंसक प्रदर्शन हुए.
31 अक्टूबर को अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में जजों ने लिखा है, "ये अजीब संयोग है कि परिवादी का नाम आसिया का अरबी में
मतलब दुराचारी होता है लेकिन इस मामले में जो परिस्थितजन्य साक्ष्य हैं उसे शेक्सपीयर के किंग लायर के शब्दों में कहा जाए तो उसके साथ पाप करने से
ज्यादा पाप हुआ है."
इसके बावजूद सरकार आसिया बीबी को बरी किए जाने पर सु्प्रीम कोर्ट के फ़ैसले की समीक्षा करानेके लिए तैयार हो गई.
सरकार विरोध प्रदर्शन करने वालों को हटाना चाहती थी लेकिन बाद में सरकार ने तहरीक-ए-लबैक पर कार्रवाई की.
तहरीक-ए-लबैक के फायरब्रैंड नेता ख़ादिम हुसैन रिज़वी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया.
आसिया के परिवारवालों को क़रीब तीन महीने तक गोपनीय जगह पर रखा गया. वह कोर्ट से बरी ज़रूर हो गईं थीं लेकिन आज़ाद नहीं हो पाई थीं.
इसके बावजूद सरकार आसिया बीबी को बरी किए जाने पर सु्प्रीम कोर्ट के फ़ैसले की समीक्षा करानेके लिए तैयार हो गई.
सरकार विरोध प्रदर्शन करने वालों को हटाना चाहती थी लेकिन बाद में सरकार ने तहरीक-ए-लबैक पर कार्रवाई की.
तहरीक-ए-लबैक के फायरब्रैंड नेता ख़ादिम हुसैन रिज़वी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया.
आसिया के परिवारवालों को क़रीब तीन महीने तक गोपनीय जगह पर रखा गया. वह कोर्ट से बरी ज़रूर हो गईं थीं लेकिन आज़ाद नहीं हो पाई थीं.
आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका पर 29 जनवरी को सुनवाई की. सुनवाई कुछ घंटे तक चली.
गुलाम मुस्तफ़ा चौधरी आसिया बीबी के ख़िलाफ़ वादी सलीम के वकील के तौर पर पेश हुए थे.
वे आसिया बीबी को बरी किए जाने के फ़ैसले में कोई ग़लती नहीं साबित कर पाए. ऐसे में कोर्ट ने याचिका ख़ारिज करते हुए पुराने फ़ैसले को कायम रखा.
पाकिस्तान के चीफ़ जस्टिस ने कहा कि आसिया के ख़िलाफ़ बयान देने वालों की गवाही में एकरूपता नहीं थी. उन्होंने ये भी कहा, "झूठी गवाहियों पर हम किसी को फांसी पर कैसे चढ़ा सकते हैं."
गुलाम मुस्तफ़ा चौधरी आसिया बीबी के ख़िलाफ़ वादी सलीम के वकील के तौर पर पेश हुए थे.
वे आसिया बीबी को बरी किए जाने के फ़ैसले में कोई ग़लती नहीं साबित कर पाए. ऐसे में कोर्ट ने याचिका ख़ारिज करते हुए पुराने फ़ैसले को कायम रखा.
पाकिस्तान के चीफ़ जस्टिस ने कहा कि आसिया के ख़िलाफ़ बयान देने वालों की गवाही में एकरूपता नहीं थी. उन्होंने ये भी कहा, "झूठी गवाहियों पर हम किसी को फांसी पर कैसे चढ़ा सकते हैं."
इस पूरे मामले को देखने के बाद, ये कहा
जा सकता है कि क्या दुर्भाग्य है कि झूठी गवाहियों पर आधारित एक मुक़दमे से पूरे देश का सामाजिक ताना बाना प्रभावित रहा. आख़िर में जब सरकार ने अपनी
ताक़त दिखाई तो क़ानून का राज स्थापित हुआ.
इसका संदेश साफ़ है, 'भीड़ का आदेश या फिर शासन पाकिस्तान में नहीं चलेगा.'
इससे ये भी स्पष्ट हुआ कि ईशनिंदा क़ानून का ग़लत इस्तेमाल की भी देश में इजाजत नहीं है.
यह पाकिस्तान के लिए ऐतिहासिक पल था. लेकिन यह क़ानून अभी भी मौजूद है. कोई भी इसमें संशोधन या फिर उसे वापस किए जाने की बात नहीं कर रहा है.
सलमान तासीर और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान भट्टी की हत्याएं अभी भी पूरे देश की आत्मा को झकझोर रही हैं.
इसका संदेश साफ़ है, 'भीड़ का आदेश या फिर शासन पाकिस्तान में नहीं चलेगा.'
इससे ये भी स्पष्ट हुआ कि ईशनिंदा क़ानून का ग़लत इस्तेमाल की भी देश में इजाजत नहीं है.
यह पाकिस्तान के लिए ऐतिहासिक पल था. लेकिन यह क़ानून अभी भी मौजूद है. कोई भी इसमें संशोधन या फिर उसे वापस किए जाने की बात नहीं कर रहा है.
सलमान तासीर और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान भट्टी की हत्याएं अभी भी पूरे देश की आत्मा को झकझोर रही हैं.
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