Friday, September 28, 2018

सलमान के साथ काम करने में आपत्ति नहीं: सनी देओल

बॉलीवुड अभिनेता सनी देओल का कहना है कि उन्हें सलमान खान के साथ काम करने में कोई आपत्ति नही है। सनी देओल ने सलमान खान के साथ नब्बे के दशक में सुपरहिट फिल्म जीत में काम किया था। इसके बाद से यह जोड़ी सिल्वर स्क्रीन पर साथ नजर नहीं आयी। सनी से जब यह पूछा गया कि क्या वे सलमान खान के साथ फिल्म करना पसंद करेंगे, उन्हाेंने कहा , “मुझे नहीं लगता कि कोई निर्माता या निर्देशक हम दोनों को एक ही फिल्म में साइन करेगा। यदि करता भी है तो हम दोनों के रोल के साथ न्याय नहीं कर पाएगा। यदि कोई स्क्रिप्ट मुझे पसंद आएगी तब मैं उनके साथ काम करने के लिए तैयार हैं। मुझे किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं है।”लीवुड अभिनेत्री दिशा पटानी का कहना है कि वह एक्टिंग के मामले में खुद को जज नहीं कर सकती है। दिशा ने वर्ष  में प्रदर्शित तेलुगू फिल्म ‘लोफर’ के जरिये एक्टिंग करियर की शुरूआत की थी। इसके बाद उन्हाेंने वर्ष  में प्रदर्शित फिल्म ‘एम.एस धोनी : द अनटोल्ड स्टोरी’ ‘कुंग फू योगा’ और ‘बागी 2’ में काम किया। दिशा इन दिनों सलमान खान के साथ फिल्म भारत में काम कर रही है। दिशा से उनके अब तक के कैरियर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा , “मैं एक्टिंग के मामले में खुद को जज नहीं कर सकती। मैं बहुत शर्मीले स्वभाव की हूं। मैंने कभी अपनी फिल्में नहीं देखी इसलिए मुझे नहीं पता लेकिन यकीनन मैं फिल्म निर्माण के इस पूरे परिवेश में सहज हो रही हूँ।”बॉलीवुड अभिनेता नाना पाटेकर ने तनुश्री दत्ता के उन पर लगाये आरोपों को नकारते हुए कहा है कि वह उन पर कानूनी कार्रवाई करेंगे। पूर्व मिस इंडिया और अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर वर्ष 2009 में ‘हॉर्न ओके प्लीज’ के सेट पर उनसे बदतमीजी करने का आरोप लगाया था। नाना ने तनुश्री के सारे आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “मैं क्या कह सकता हूं कि वह ऐसा क्यों कह रही हैं? मैं कैसे जान सकता हूं कि वह ये सब क्यों बोल रही हैं? यौन शोषण से उनका क्या मतलब है? सेट पर मेरे साथ 50 से 100 लोग रहते थे।” नाना ने कहा, “ मैं उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करूंगा लेकिन यह सब मीडिया को बताने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि आप तो कुछ भी चलाएंगे। जिसे जो कहना है कहता रहे, मैं अपना काम करता रहूंगा।” उल्लेखनीय है कि तनुश्री ने नाना पर आरोप लगाते हुये कहा था कि नाना का औरतों से छेड़छाड़ का इतिहास रहा है। इंडस्ट्री में सभी को पता है कि वह औरतों के साथ बदतमीजी करते हैं। उन्होंने नाना पर ऐक्ट्रेसेज पर हाथ उठाने का भी आरोप लगाया।की सबसे बड़ी पार्टियों में से एक, भाजपा में बड़े बदलाव की बयार चल पड़ी है। यह इसके पितृ अथवा मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का अपने रणनीतिक उद्देश्यों तथा सिद्धांतों के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव है। केशव बलिराम हेडगवार द्वारा 27 सितंबर 1925 को नागपुर में स्थापित आरएसएस मूलतः एक सामाजिक संगठन है जो कि इसलिए विशेष रूप से जाना जाता है क्योंकि इसका उद्देश्य हिंदू हितों को संरक्षित करना रहा है। अन्य धर्मों, विशेषकर इस्लाम की ओर से हो रहे आक्रमणों से हिंदू हितों की रक्षा करना इसका मूल उद्देश्य रहा है। इस संगठन में शुरू से ही मुस्लिम व ईसाई सदस्य रहे हैं, इसके बावजूद यह हिंदू समर्थक संगठन बना रहा। यह नरेंद्र मोदी हैं जो वर्ष 2014 के चुनाव से पहले इसे ज्यादा उदारवादी बनाते हुए इसकी विचारधारा में बदलाव लेकर आए। उन्होंने सबका साथ सबका विकास का नारा दिया जिससे यह प्रतिस्थापित हो गया कि राजनीतिक पार्टी भाजपा धर्म अथवा जाति का भेदभाव किए बिना सभी के लिए काम करेगी। यह एक बड़ी भूमिका वाली पुनः परिभाषा थी जो मोदी द्वारा की गई तथा कुछ लोगों ने इसे दिशा सहीकरण बताया। अब तक उपलब्ध साहित्य व नेताओं द्वारा दिए गए संबोधनों का सार यह रहा है कि पार्टी हिंदू समर्थक संगठन है तथा बहुसंख्यक समुदाय के हितों को संरक्षित करती रहेगी। वास्तव में यह प्रक्रिया अति सूक्ष्म रूप से अटल बिहारी वाजपेयी के काल में ही शुरू हो गई थी। वह ऐसे व्यक्ति थे जो अपने दृष्टिकोण में उदारवादी तथा व्यापक हितधारक थे। इसलिए उन्होंने पार्टी की कार्यशैली में खुलेपन का अंदाज लाया जिससे न्यायसंगत मानव चिंताओं को इसमें स्थान मिला। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हिंदुत्व के अपने मूल मार्ग पर चलता रहा। कई बार यह भय भी अभिव्यक्त हुआ कि आरएसएस वाजपेयी शैली का उदारवाद अस्वीकृत भी कर सकता है।
नरेंद्र मोदी ने इस प्रक्रिया को और विस्तार देते हुए एक नई नीति की परिपाटी स्थापित की कि हम संविधान की भावना के अनुकूल हिंदू और मुसलमानों के साथ समान व्यवहार करेंगे ताकि संविधान में परिकल्पित समानता तथा न्याय को प्राप्त किया जा सके। किंतु इसने मुसलमानों से अधिमान्य समूह की भावना को छीन लिया। कांग्रेस के राज में यह भावना मुसलमानों की मत-शक्ति के कारण उत्पन्न हुई थी न कि छद्म पंथनिरपेक्षता के कारण जैसी कि उन्होंने परिकल्पित की। सभी दलों के लिए अल्पसंख्यकों के वोट का महत्त्व बहुत अधिक है क्योंकि वे एक सेगमेंट के रूप में अपने निर्णय सामूहिक रूप से करते हैं। बहुसंख्यक समुदाय का इस लिहाज से कोई महत्त्व नहीं है क्योंकि वे जातीय आधार पर बंटे हुए हैं। परिणामस्वरूप होने यह लगा कि जो पार्टी इस समुदाय के सबसे अधिक अनुकूल लगती थी, उसी के पक्ष में इस समुदाय का झुकाव हो जाता था। वे अब तक विशिष्ट स्थिति का लाभ उठा रहे थे, किंतु हाल के दिनों में उन्हें चुनौती उभरती दिखाई दी।
विशेषाधिकार के लिए संघर्ष कानून के अंतर्गत अनुरक्षणीय नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस वक्तव्य का अकसर उद्वरण दिया जाता है कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। इस वक्तव्य को तुष्टिकरण के रूप में देखा जाता रहा है। सवाल यह है कि जब संविधान पक्षपात व अधिमान्य व्यवहार की अनुमति देता ही नहीं तो क्यों किसी का पहला अधिकार होना चाहिए। मनमोहन सिंह जैसे विशुद्ध अर्थशास्त्री के प्रधानमंत्री पद पर होते हुए उन्हें क्या जरूरत थी कि वह इस तरह का वक्तव्य देते जिसकी पैरवी करना बहुत मुश्किल है। लेकिन धर्म व जाति के आधार पर वोट पाने की परिपाटी जारी रही। मैं समझता हूं कि संवैधानिक रूप से स्वीकृत बिना पक्षपात के समानता व न्याय वाला दृष्टिकोण जिसे मोदी ने प्रतिस्थापित किया है, यही आरएसएस में प्रचलित था जो कि मोहन भागवत द्वारा परिकल्पित किए गए बदलावों से जाहिर है। भाजपा व आरएसएस दोनों एक ही दिशा में चल रहे लगते हैं तथा इस पर विरोधियों द्वारा अकसर सवाल उठाए जाते रहे हैं। यह बात वास्तव में मूल हिंदू दृष्टिकोण में है जो कि इसके धर्मग्रंथ में प्रतिपादित है जिसमें सभी के सुखी व स्वस्थ होने की कामना की जाती है, भले ही वह उस धर्म का अनुयायी न ही हो। स्वामी विवेकानंद इस विचार का प्रतिपादन करने वाले शायद पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हमारी धरोहर की अंतर-लहर को महसूस किया। वास्तव में हमारा मूल धर्म वैदिक है जिसमें बाद में पुजारियों के स्वार्थ के कारण कुछ रीति-नीति व अंधविश्वास आ गए जिन्होंने मूल धर्म को हानि पहुंचाने का काम किया। बहुत बाद में भारत पर हमला करने वाले विदेशी आक्रांताओं के हिंसक कार्यों व अत्याचारों से ये मिक्स हो गईं। जैसा कि हम अपने मंदिरों को भूल गए थे और उन पर धूल जम गई थी, मूल धर्म को फिर से प्रतिस्थापित करने का समय आ गया है। भारत इस तरह के जघन्य इतिहास से भी गुजर चुका है कि लोग यही भूल गए थे कि गौतम बुद्ध का जन्म कहां पर हुआ था।
यह बहुत बाद में हुआ कि जापानी तीर्थ यात्री गया में इन मंदिरों के भ्रमण को आए तथा इस महान घटनाक्रम को लुंबिनी से जोड़ते हुए धूल की परतें हटाई गईं। भारत के भविष्य पर जो तीन दिन का सम्मेलन हुआ, उसमें आरएसएस ने अपना नया चेहरा प्रोजेक्ट किया है, यह इसका नया अवतार हो सकता है। लेकिन जब भविष्य की बात हो रही हो तो मसले को इतिहास के झरोखे में छिपाया नहीं जा सकता। भावी संबंधों में भाजपा का क्या प्रतिरूप होगा तथा उसकी भावी संभावनाएं क्या हैं, इस संबंध में एक पूरी कहानी बताने की जरूरत है। आने वाले दिनों में इन विषयों पर भी व्यापक विचार-विमर्श होता रहेगा तथा मैं फिर से विस्तृत समीक्षा पेश करूंगा।

Friday, September 14, 2018

नज़रियाः क्या तेजस्वी और तेज प्रताप के रास्ते अलग हो रहे हैं?

लालू यादव के परिवार में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. 10 सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी देवी के आधिकारिक निवास पर 11 सितंबर को हुई पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की बैठक में उनके बड़े बेटे तेज प्रताप की अनुपस्थिति ने अटकलों के बाज़ार को गरम कर दिया है.
दिलचस्प तो यह है कि तेज प्रताप उसी बंगले में थे लेकिन बैठक में नहीं आए.
रिपोर्ट्स के मुताबिक इस दौरान उन्होंने खुद को एक कमरे के भीतर बंद कर रखा था.
यह बैठक अगले लोकसभा चुनाव की रणनीति तैयार करने के लिए बुलाई गई थी और इसकी अध्यक्षता बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता और तेज के छोटे भाई तेजस्वी यादव कर रहे थे.
पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और उनकी सांसद बेटी मीसा भारती भी इस बैठक में मौजूद थीं.पोर्टों के मुताबिक राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के महागठबंधन के बाद जब तेजस्वी ने 20 नवंबर 2015 को उपमुख्यमंत्री का पद संभाला तो उनके शपथ लेने से पहले भी तेज ने हंगामा खड़ा कर दिया था.
आखिर उन्हें उनके माता-पिता ने स्वास्थ्य मंत्रालय संभालने के लिए राजी कर लिया.
लेकिन पिछले 22 महीनों के दौरान आरजेडी की अंदरुणी राजनीति में बहुत कुछ हुआ है.
तेज प्रताप की अब शादी हो चुकी है. मीडिया रिपोर्टों मुताबिक पहले उन्हें अपनी मां का समर्थन प्राप्त था लेकिन अब मामला बदल गया है.
अब वो अलग-थलग पड़ गए हैं, जिसके सबूत 11 सितंबर को हुई पार्टी की यह बैठक खुद ही है.
यहां तक कि कुछ समय पहले तेज़ प्रताप ने अपनी एक फ़ेसबुक पोस्ट में भी यह शिकायत की थी कि अब उनकी मां भी नहीं सुनती हैं. बाद में उन्होंने इस बात से इंकार कर दिया कि उन्होंने ऐसा कुछ लिखा था और इस पोस्ट के लिए दूसरों पर आरोप मढ़ दिया.
आरजेडी के मुखिया के परिवार को निश्चित ही उनके बर्ताव की वजह से कइयों बार शर्मिंदा होना पड़ा है, लेकिन पार्टी के दिग्गज इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि वो संकट के इस दौर पर काबू पा लेंगे और बड़े बेटे को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जाएगा.
पार्टी के एक बड़े नेता ने अपना नाम जाहिर नहीं किए जाने की शर्त पर इस स्थिति की तुलना डीएमके पार्टी से किया, जहां पिता करुणानिधि ने छोटे भाई स्टालिन को अपना सियासी वारिस बना दिया और बड़े भाई अलागिरी को पार्टी के बाहर कर दिया था.
वो लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के उस फ़ैसले का उदाहरण देते हैं कि किस तरह से आरजेडी सुप्रीमो ने परेशानी का सबब बने अपने सालों साधु यादव और सुभाष यादव से पार पाया था.
वास्तव में, खुद पार्टी के भीतर यह आम राय थी कि उन दोनों ने पार्टी को फ़ायदा पहुंचाने की जगह ज़्यादा नुकसान पहुंचाया था.लांकि, इसे देखते हुए कि भारतीय जनता पार्टी आरजेडी की किसी भी चूक का फ़ायदा उठाने के लिए तैयार है, बड़े बेटे की चुनौती पर काबू पाना उतना मुश्किल नहीं होगा.
वैसे ये बता दें कि बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे, जिन्होंने 2013 में उनसे मिलने गांधीनगर पहुंचे साधु यादव का तब अपने घर पर स्वागत किया था.
भारतीय जनता पार्टी हमेशा ही तेज प्रताप को लेकर नरम रही है. बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की तरफ से 12 सितंबर को हुई उस बैठक पर जल्द ही प्रतिक्रिया भी आ गई जिसमें उन्होंने अगले चुनाव में आरजेडी के विघटन और महागठबंधन के हार की भविष्यवाणी की.
इस सब के बीच यह एक बेहद दिलचस्प पहलू है कि राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, मीसा और हेमा (लालू-राबड़ी की एक और बेटी) पर सुशील मोदी पहले भी आरोप लगाते रहे हैं लेकिन तेज प्रताप के ख़िलाफ़ उन्होंने कभी भी कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं मढ़े.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह मानना है कि केंद्रीय एजेंसियों का किसी भी जांच से तेज प्रताप को बाहर रखना इस तथ्य की ओर इशारा करता है कि आरजेडी सुप्रीमो के परिवार के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे इस पूरे अभियान के राजनीतिक मायने भी हैं.
एक आम राय है कि "यदि परिवार में हर कोई भ्रष्ट है तो तेज प्रताप भला कैसे साफ़ हो सकते हैं."
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरु गोविंद सिंह की 350वीं जयंती में भाग लेने के लिए 5 जनवरी, 2017 को पटना गए थे तब उन्होंने कृष्ण की अराधना के लिए तेज प्रताप की प्रशंसा करने के लिए समय निकाला था.
संयोग से, भाजपा और उसकी सहयोगी जेडीयू की चुप रहने और तेज़ की आलोचना से बचने की रणनीति तब भी जारी रही जब तेज ने सार्वजनिक रूप से एनडीए नेताओं की आलोचना की. एक बार उन्होंने यह भी कहा कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खाल उधड़वा देंगे.
हालांकि भगवा पार्टी के नेताओं ने इसकी आलोचना की लेकिन उनकी प्रतिक्रिया उतनी तीखी नहीं थी. बिहार की राजनीतिक गतिविधियों पर नज़र रखने वालों के अनुसार भाजपा भविष्य में तेज के साथ संबंधों का फायदा उठाएगी.
कुछ निष्पक्ष विश्लेषकों का मानना है कि आरजेडी या महागठबंधन को बाहर यानी एनडीए से कोई ख़ास ख़तरा नहीं है, बल्कि समस्याएं तो पार्टी के भीतर से ही हो सकती है.
लेकिन आरजेडी नेताओं को भरोसा है कि वो इस चुनौती से उबर जाएंगे. वास्तव में परिवार के सभी सदस्यों ने तेज के कार्यक्रमों से खुद को अगल करना शुरू कर दिया है.
तेज के साथ समस्या यह है कि उनका आरजेडी के पूर्व मंत्री चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या से शादी हुई है.

Tuesday, September 4, 2018

रज-पर्व: जब 3 दिनों के लिए धरती को पीरियड्स आते हैं


ओडिशा का सबसे बड़ा त्यौहार रज-पर्व चल रहा है. आज उसका तीसरा और आखिरी दिन है. ओडिशा के लोग मानते हैं कि इस दौरान पृथ्वी के पीरियड्स आते हैं. ये त्यौहार औरत होने की फीलिंग को सेलिब्रेट करता है.
ओडिशा का छोटा सा गांव, बालेश्वर. वहां के लोग ‘बालासोर’ कहते हैं. मैंने उस शहर में दो साल बिताए हैं. ऐसे सुनने में तो दो साल मतलब कुछ भी नहीं लगता. लेकिन वो दो साल मेरी ज़िन्दगी के बहुत बड़े टर्निंग पॉइंट रहे हैं.
खैर, ओडिशा की हवा में बहुत अपनापन है. बहुत सादगी है. ताज़ी हवा है. लोग आराम की ज़िन्दगी जीते हैं.
जैसी हमारे गांव में सर्दी की दोपहर होती है, गर्मियों की शामें होती हैं. वैसी आराम की ज़िन्दगी बालासोर में मुझे हर रोज़ दिखती थी. कोई जल्दीबाज़ी नहीं. कोई बेमतलब की हड़बड़ी नहीं. चैन से जीते हैं. छककर डालमा, पोखाड़, माछ और साग खाते हैं. दोपहर में भी 3-4 घंटे सोते हैं. पंखे से मक्खी-मच्छर उड़ाते रहते हैं. औरतें पल्ला निचोड़ कर पसीना सुखाती हैं. बड़े से भगोने में घर-भर के लिए नीम्बू-पानी बनता है. गोले में बैठकर एक-एक घूंट सब पीते हैं और भगोना आगे बढ़ाते जाते हैं.
बहुत सी यादें हैं. लेकिन सबसे खूबसूरत जो याद है वहां की. वो है ओडिशा के सबसे खूबसूरत त्यौहार की. रज-पर्व.
जब पता चला था, मुझे आश्चर्य हुआ था. बड़े शहरों में मॉडर्न होने के नाम पर बहुत बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं. पर पीरियड्स आज भी एक टैबू बना हुआ है. लेकिन आज भी पीरियड्स के दौरान लड़कियों को मंदिर में जाना सख्त मना होता है. सबरीमाला मंदिर ने तो कुछ महीने पहले नोटिस भी जारी कर दिया था. 10 से 50 साल तक की औरतें पीरियड्स के दौरान मंदिर में घुस ही नहीं सकतीं. मेरी भी हमेशा इस बात पर मम्मी से लड़ाई होती थी. पीरियड्स से जुड़ी बहत्तरों तरह की गलतफहमियां हैं. लेकिन ओडिशा में पीरियड्स का त्यौहार मनाया जाता है. इस नेच्युरल प्रोसेस को सेलेब्रेट किया जाता है. कितनी खुशनुमा सी खबर है ये. ‘ब्रीज ऑफ फ्रेश एयर’.

रज-पर्व: जब 3 दिनों तक भूदेवी के पीरियड्स आते हैं

ओडिशा के लोग मानते हैं कि पृथ्वी भगवान विष्णु (भगवान जगन्नाथ) की पत्नी हैं. देवी हैं. भूदेवी. जब गर्मियां ख़त्म होने वाली होती हैं. मानसून आने को होता है. कहा जाता है कि उस वक़्त भूदेवी को पीरियड्स आते हैं. 3 दिनों तक. इसीलिए इस दौरान उनको आराम करने की ज़रूरत होती है. इन 3 दिनों में कटाई, बोआई या जमीन से जुड़ा इस तरह का कोई काम नहीं किया जाता जिससे उनको तकलीफ हो. घर की लड़कियों और औरतों को भी इस दिन आराम दिया जाता है.
जब किसी औरत को पीरियड्स होते हैं उसको उड़िया भाषा में रजस्वला कहा जाता है. वहीं से ये शब्द आया है. रज. और इसीलिए इस त्यौहार को कहा जाता है रज-पर्व. पीरियड्स का त्यौहार. 
गांव के एक बुज़ुर्ग ने बताया था कि ये त्यौहार किसानों और फसलों से भी जुड़ा हुआ है. पीरियड्स होने का मतलब है कि लड़की चाहे तो एक नई ज़िन्दगी को पैदा कर सकती है. वैसे ही इस त्यौहार का मतलब है कि हमारी पृथ्वी फर्टाइल है. इसमें फसलें उग सकती हैं. इस त्यौहार  से पहले सारी फसलें काटी जा चुकी होती हैं. इस दौरान किसान आराम करते हैं. घर की औरतें भी आराम करती हैं. और ज़मीन भी आराम करती है.



र दिनों का फेस्टिवल. हर दिन के अलग-अलग नाम. और हर दिन अपने-आप में ख़ास.
जैसे रज-पर्व शुरू होने के पहले का जो दिन होता है उसको सज-रज कहा जाता है. पीरियड्स के पहले का दिन. इस दिन खाने की खूब सारी चीज़ें बना कर एक जगह स्टोर कर ली जाती हैं. पुराने ज़माने में यही स्टोर किया हुआ खाना आगे के 3 दिनों तक खाया जाता था. लड़कियां अच्छे से तैयार  कपड़ों और गहनों से सजती है. घर की ज़मीन का कोना साफ़ किया जाता है. उसको भी अच्छे से सजाया जाता है. आने वाले तीन दिनों के लिए उसको तैयार किया जाता है. मेरी दोस्त की मम्मी ने बताया था कि ऐसा करने से पीरियड्स के दौरान भूदेवी को दर्द और तकलीफें कम होती हैं.
पर्व का पहला दिन होता है पहिली रज. दूसरा वाला दिन, मिथुन संक्रांति और तीसरा दिन जिस दिन पीरियड्स ख़त्म माने जाते हैं उसको कहते हैं बासी-रज. इन तीन दिनों में लड़कियां अच्छे-अच्छे कपड़े और गहने पहनती हैं. सजती हैं. मेहंदी लगाती हैं. झूला झूलती हैं. घर के काम से उनको इन 3 दिनों की छुट्टी मिल जाती है. अपने दोस्तों के साथ दिन भर बैठ कर बातें करती हैं. हंसती हैं, खूब मस्ती करती हैं. शहरों में त्यौहार कम ही दिखता है. असली मज़ा गांव में ही आता है.
इस फेस्टिवल की सबसे अच्छी चीज़ है खूब सारी वैरायटी का खाना. ओडिशा की सबसे स्पेशल डिश है पीठा. चावल के आटे से बनी हर मीठी, नमकीन डिश को पीठा कहते हैं. पोड़ पीठा, चकुली पीठा, मंडा पीठा, आसिरा पीठा. ये लिस्ट ख़त्म ही नहीं होती. रज-पर्व में सबसे ज्यादा पोड़ पीठा बनता है.
रज में पान खाना भी ट्रेडिशन का एक हिस्सा है. मीठे पान में भी दसियों चॉइस होती है. खाने के बाद अगर मीठे की तलब होती हो तो वो भी सिर्फ पान खा कर ख़त्म हो जाएगी.
घरों के आस-पास और गांव भर में जगह-जगह झूले लगते हैं. मेला लगता है. घर का हर मेम्बर इन 3 दिनों में पूरे एन्जॉयमेंट के मूड में रहता है.