"मेरी छह साल की बेटी का क्या कसूर था? उसके एक पांव में फ्रैक्चर के
साथ ही तीन दिनों से तेज़ बुखार था और सांस लेने में तकलीफ थी. लेकिन
डाक्टरों की हड़ताल के बाद उसका इलाज बंद हो गया था. नर्सों ने भी काम करना
बंद कर दिया था."
नाज़िया अपनी बात पूरी नहीं कर पाती. शनिवार को पूरे दिन अस्पतालों के चक्कर लगाने के बाद दक्षिण 24-परगना जिले की नाज़िया बीबी की बच्ची ने रविवार को दम तोड़ दिया.
एक सप्ताह पहले मोटरसाइकिल हादसे में घायल कौशिक दास का एनआरएस मेडिकल कालेज अस्पताल में पांव का आपरेशन हुआ था. उसके पिता विश्वनाथ दास आरोप लगाते हैं कि इलाज नहीं होने की वजह से कौशिक के पांव में इंफेक्शन हो गया था जिसने शनिवार को उसकी जान ले ली. इसी अस्पताल में विजय बनर्जी की मां मंजू देवी की भी मौत हो गई. वह वेंटीलेटर पर थीं.
विजय बताते हैं, "मैंने नर्स से आक्सीजन और दवा देने का अनुरोध किया. लेकिन उसका कहना था कि डाक्टरों की अनुमति के बिना वह कुछ नहीं कर सकतीं."
मेदिनीपुर की तनुजा मंडल ने भी एसएसकेएम अस्पताल में शनिवार को दम तोड़ दिया. उसके पति प्रशांत बताते हैं, "तनुजा को ज्यादा दिक्कत नहीं थी. सांस में तकलीफ़ की वजह से वह इलाज के लिए उसे मेदिनीपुर से कोलकाता ले आए थे."
लेकिन तब उनको कहां पता था कि यह उसका आखिरी सफर साबित होगा.
कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कालेज अस्पताल में 75 साल के एक मरीज की मौत और उसके बाद दो जूनियर डाक्टरों के साथ मारपीट के बाद डाक्टरों की हड़ताल से जहां पूरे राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो गई हैं वहीं मरीज भी इलाज के अभाव में लगाता दम तोड़ रहे हैं. हालांकि सरकार ने अब तक इन मौतों का कोई आंकड़ा नहीं जारी नहीं किया है. लेकनि मोटे अनुमान के मुताबिक राज्यभर में 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.
रविवार को छठे दिन भी डाक्टरों की हड़ताल खत्म होने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं. राज्य सरकार और हड़तली डाक्टरों के अड़ियल रवैए की वजह से गतिरोध टूटने का नाम नहीं ले रहा हैं. दोनों पक्षों की इस खींचतान के बीच बेहतर इलाज की उम्मीद में दूर-दराज के इलाकों से रोज़ाना हजारों की तादाद में कोलकाता पहुंचने वाले गरीबों को हताश होकर खाली हाथ लौटना पड़ रहा है.
राज्य के 18 मेडिकल कालेज अस्पताल परिसरों में इलाज के अभाव में होने वाली मौतों और खाली हाथ लौटने वालों लोगों की अनगिनत कहानियां हवा में तैर रही हैं. उनमें से कोई सरकार और डाक्टरों को कोस रहा है तो कोई अपनी फूटी किस्मत को.
जो लोग पहले से इन अस्पतालों में दाखिल थे वह भी अपने परिजनों के साथ अस्पताल छोड़ रहे हैं. पहले दो-चार दिनों तक वे इस आस में टिके थे कि शायद आंदोलन जल्दी खत्म हो जाए. लेकिन अब परिजन अपने लोगों को अस्पताल से रिहा कर घर ले जा रहे हैं. नतीजतन ज्यादातार अस्पतालों के तमाम वार्डों में पहले जहां तिल धरने तक की जगह नहीं होती थी वहीं अब तस्वीर एकदम उलट गई है. तमाम बिस्तर खाली पड़े हैं.
एसएसकेएम अस्पताल से अपने बुजुर्ग पिता को साथ ले जा रहे मृदुल विश्वास कहते हैं, "बाहर कहीं इलाज कराएंगे. यहां रहे तो मौत तय है. दोनों पक्ष अपने अहं पर अड़े हैं. लेकिन मरीजों के हितों की किसी को चिंता नहीं है."
उत्तर 24-परगना जिले के बशीरहाट में रहने वाले मोहम्मद अल्ताफ़ अपनी दो साल की बेटी के साथ रोजाना लोकल ट्रेन से तीन घंटे का सफर कर कोलकाता पहुंच रहे हैं. इस उम्मीद में भी शायद उनकी बेटी को अब अस्पताल में दाख़िला मिल जाएगा. लेकितन शाम ढलते ही वे मायूस हो कर घर वापसी की लोकल पकड़ लेते हैं. उनकी बेटी को टीबी है.
नाज़िया अपनी बात पूरी नहीं कर पाती. शनिवार को पूरे दिन अस्पतालों के चक्कर लगाने के बाद दक्षिण 24-परगना जिले की नाज़िया बीबी की बच्ची ने रविवार को दम तोड़ दिया.
एक सप्ताह पहले मोटरसाइकिल हादसे में घायल कौशिक दास का एनआरएस मेडिकल कालेज अस्पताल में पांव का आपरेशन हुआ था. उसके पिता विश्वनाथ दास आरोप लगाते हैं कि इलाज नहीं होने की वजह से कौशिक के पांव में इंफेक्शन हो गया था जिसने शनिवार को उसकी जान ले ली. इसी अस्पताल में विजय बनर्जी की मां मंजू देवी की भी मौत हो गई. वह वेंटीलेटर पर थीं.
विजय बताते हैं, "मैंने नर्स से आक्सीजन और दवा देने का अनुरोध किया. लेकिन उसका कहना था कि डाक्टरों की अनुमति के बिना वह कुछ नहीं कर सकतीं."
मेदिनीपुर की तनुजा मंडल ने भी एसएसकेएम अस्पताल में शनिवार को दम तोड़ दिया. उसके पति प्रशांत बताते हैं, "तनुजा को ज्यादा दिक्कत नहीं थी. सांस में तकलीफ़ की वजह से वह इलाज के लिए उसे मेदिनीपुर से कोलकाता ले आए थे."
लेकिन तब उनको कहां पता था कि यह उसका आखिरी सफर साबित होगा.
कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कालेज अस्पताल में 75 साल के एक मरीज की मौत और उसके बाद दो जूनियर डाक्टरों के साथ मारपीट के बाद डाक्टरों की हड़ताल से जहां पूरे राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो गई हैं वहीं मरीज भी इलाज के अभाव में लगाता दम तोड़ रहे हैं. हालांकि सरकार ने अब तक इन मौतों का कोई आंकड़ा नहीं जारी नहीं किया है. लेकनि मोटे अनुमान के मुताबिक राज्यभर में 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.
रविवार को छठे दिन भी डाक्टरों की हड़ताल खत्म होने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं. राज्य सरकार और हड़तली डाक्टरों के अड़ियल रवैए की वजह से गतिरोध टूटने का नाम नहीं ले रहा हैं. दोनों पक्षों की इस खींचतान के बीच बेहतर इलाज की उम्मीद में दूर-दराज के इलाकों से रोज़ाना हजारों की तादाद में कोलकाता पहुंचने वाले गरीबों को हताश होकर खाली हाथ लौटना पड़ रहा है.
राज्य के 18 मेडिकल कालेज अस्पताल परिसरों में इलाज के अभाव में होने वाली मौतों और खाली हाथ लौटने वालों लोगों की अनगिनत कहानियां हवा में तैर रही हैं. उनमें से कोई सरकार और डाक्टरों को कोस रहा है तो कोई अपनी फूटी किस्मत को.
जो लोग पहले से इन अस्पतालों में दाखिल थे वह भी अपने परिजनों के साथ अस्पताल छोड़ रहे हैं. पहले दो-चार दिनों तक वे इस आस में टिके थे कि शायद आंदोलन जल्दी खत्म हो जाए. लेकिन अब परिजन अपने लोगों को अस्पताल से रिहा कर घर ले जा रहे हैं. नतीजतन ज्यादातार अस्पतालों के तमाम वार्डों में पहले जहां तिल धरने तक की जगह नहीं होती थी वहीं अब तस्वीर एकदम उलट गई है. तमाम बिस्तर खाली पड़े हैं.
एसएसकेएम अस्पताल से अपने बुजुर्ग पिता को साथ ले जा रहे मृदुल विश्वास कहते हैं, "बाहर कहीं इलाज कराएंगे. यहां रहे तो मौत तय है. दोनों पक्ष अपने अहं पर अड़े हैं. लेकिन मरीजों के हितों की किसी को चिंता नहीं है."
उत्तर 24-परगना जिले के बशीरहाट में रहने वाले मोहम्मद अल्ताफ़ अपनी दो साल की बेटी के साथ रोजाना लोकल ट्रेन से तीन घंटे का सफर कर कोलकाता पहुंच रहे हैं. इस उम्मीद में भी शायद उनकी बेटी को अब अस्पताल में दाख़िला मिल जाएगा. लेकितन शाम ढलते ही वे मायूस हो कर घर वापसी की लोकल पकड़ लेते हैं. उनकी बेटी को टीबी है.
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