Tuesday, September 4, 2018

रज-पर्व: जब 3 दिनों के लिए धरती को पीरियड्स आते हैं


ओडिशा का सबसे बड़ा त्यौहार रज-पर्व चल रहा है. आज उसका तीसरा और आखिरी दिन है. ओडिशा के लोग मानते हैं कि इस दौरान पृथ्वी के पीरियड्स आते हैं. ये त्यौहार औरत होने की फीलिंग को सेलिब्रेट करता है.
ओडिशा का छोटा सा गांव, बालेश्वर. वहां के लोग ‘बालासोर’ कहते हैं. मैंने उस शहर में दो साल बिताए हैं. ऐसे सुनने में तो दो साल मतलब कुछ भी नहीं लगता. लेकिन वो दो साल मेरी ज़िन्दगी के बहुत बड़े टर्निंग पॉइंट रहे हैं.
खैर, ओडिशा की हवा में बहुत अपनापन है. बहुत सादगी है. ताज़ी हवा है. लोग आराम की ज़िन्दगी जीते हैं.
जैसी हमारे गांव में सर्दी की दोपहर होती है, गर्मियों की शामें होती हैं. वैसी आराम की ज़िन्दगी बालासोर में मुझे हर रोज़ दिखती थी. कोई जल्दीबाज़ी नहीं. कोई बेमतलब की हड़बड़ी नहीं. चैन से जीते हैं. छककर डालमा, पोखाड़, माछ और साग खाते हैं. दोपहर में भी 3-4 घंटे सोते हैं. पंखे से मक्खी-मच्छर उड़ाते रहते हैं. औरतें पल्ला निचोड़ कर पसीना सुखाती हैं. बड़े से भगोने में घर-भर के लिए नीम्बू-पानी बनता है. गोले में बैठकर एक-एक घूंट सब पीते हैं और भगोना आगे बढ़ाते जाते हैं.
बहुत सी यादें हैं. लेकिन सबसे खूबसूरत जो याद है वहां की. वो है ओडिशा के सबसे खूबसूरत त्यौहार की. रज-पर्व.
जब पता चला था, मुझे आश्चर्य हुआ था. बड़े शहरों में मॉडर्न होने के नाम पर बहुत बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं. पर पीरियड्स आज भी एक टैबू बना हुआ है. लेकिन आज भी पीरियड्स के दौरान लड़कियों को मंदिर में जाना सख्त मना होता है. सबरीमाला मंदिर ने तो कुछ महीने पहले नोटिस भी जारी कर दिया था. 10 से 50 साल तक की औरतें पीरियड्स के दौरान मंदिर में घुस ही नहीं सकतीं. मेरी भी हमेशा इस बात पर मम्मी से लड़ाई होती थी. पीरियड्स से जुड़ी बहत्तरों तरह की गलतफहमियां हैं. लेकिन ओडिशा में पीरियड्स का त्यौहार मनाया जाता है. इस नेच्युरल प्रोसेस को सेलेब्रेट किया जाता है. कितनी खुशनुमा सी खबर है ये. ‘ब्रीज ऑफ फ्रेश एयर’.

रज-पर्व: जब 3 दिनों तक भूदेवी के पीरियड्स आते हैं

ओडिशा के लोग मानते हैं कि पृथ्वी भगवान विष्णु (भगवान जगन्नाथ) की पत्नी हैं. देवी हैं. भूदेवी. जब गर्मियां ख़त्म होने वाली होती हैं. मानसून आने को होता है. कहा जाता है कि उस वक़्त भूदेवी को पीरियड्स आते हैं. 3 दिनों तक. इसीलिए इस दौरान उनको आराम करने की ज़रूरत होती है. इन 3 दिनों में कटाई, बोआई या जमीन से जुड़ा इस तरह का कोई काम नहीं किया जाता जिससे उनको तकलीफ हो. घर की लड़कियों और औरतों को भी इस दिन आराम दिया जाता है.
जब किसी औरत को पीरियड्स होते हैं उसको उड़िया भाषा में रजस्वला कहा जाता है. वहीं से ये शब्द आया है. रज. और इसीलिए इस त्यौहार को कहा जाता है रज-पर्व. पीरियड्स का त्यौहार. 
गांव के एक बुज़ुर्ग ने बताया था कि ये त्यौहार किसानों और फसलों से भी जुड़ा हुआ है. पीरियड्स होने का मतलब है कि लड़की चाहे तो एक नई ज़िन्दगी को पैदा कर सकती है. वैसे ही इस त्यौहार का मतलब है कि हमारी पृथ्वी फर्टाइल है. इसमें फसलें उग सकती हैं. इस त्यौहार  से पहले सारी फसलें काटी जा चुकी होती हैं. इस दौरान किसान आराम करते हैं. घर की औरतें भी आराम करती हैं. और ज़मीन भी आराम करती है.



र दिनों का फेस्टिवल. हर दिन के अलग-अलग नाम. और हर दिन अपने-आप में ख़ास.
जैसे रज-पर्व शुरू होने के पहले का जो दिन होता है उसको सज-रज कहा जाता है. पीरियड्स के पहले का दिन. इस दिन खाने की खूब सारी चीज़ें बना कर एक जगह स्टोर कर ली जाती हैं. पुराने ज़माने में यही स्टोर किया हुआ खाना आगे के 3 दिनों तक खाया जाता था. लड़कियां अच्छे से तैयार  कपड़ों और गहनों से सजती है. घर की ज़मीन का कोना साफ़ किया जाता है. उसको भी अच्छे से सजाया जाता है. आने वाले तीन दिनों के लिए उसको तैयार किया जाता है. मेरी दोस्त की मम्मी ने बताया था कि ऐसा करने से पीरियड्स के दौरान भूदेवी को दर्द और तकलीफें कम होती हैं.
पर्व का पहला दिन होता है पहिली रज. दूसरा वाला दिन, मिथुन संक्रांति और तीसरा दिन जिस दिन पीरियड्स ख़त्म माने जाते हैं उसको कहते हैं बासी-रज. इन तीन दिनों में लड़कियां अच्छे-अच्छे कपड़े और गहने पहनती हैं. सजती हैं. मेहंदी लगाती हैं. झूला झूलती हैं. घर के काम से उनको इन 3 दिनों की छुट्टी मिल जाती है. अपने दोस्तों के साथ दिन भर बैठ कर बातें करती हैं. हंसती हैं, खूब मस्ती करती हैं. शहरों में त्यौहार कम ही दिखता है. असली मज़ा गांव में ही आता है.
इस फेस्टिवल की सबसे अच्छी चीज़ है खूब सारी वैरायटी का खाना. ओडिशा की सबसे स्पेशल डिश है पीठा. चावल के आटे से बनी हर मीठी, नमकीन डिश को पीठा कहते हैं. पोड़ पीठा, चकुली पीठा, मंडा पीठा, आसिरा पीठा. ये लिस्ट ख़त्म ही नहीं होती. रज-पर्व में सबसे ज्यादा पोड़ पीठा बनता है.
रज में पान खाना भी ट्रेडिशन का एक हिस्सा है. मीठे पान में भी दसियों चॉइस होती है. खाने के बाद अगर मीठे की तलब होती हो तो वो भी सिर्फ पान खा कर ख़त्म हो जाएगी.
घरों के आस-पास और गांव भर में जगह-जगह झूले लगते हैं. मेला लगता है. घर का हर मेम्बर इन 3 दिनों में पूरे एन्जॉयमेंट के मूड में रहता है.


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